समय खरीदना सीखें। Learn to buy time.
आपके लिए कौन सी चीज ज्यादा महत्वपूर्ण है : समय या धन ? आप इन दोनों में से किसे बचाने की ज्यादा कोशिश करते हैं? आप पैसेंजर ट्रेन से यात्रा करना पसंद करते हैं या सुपरफास्ट ट्रेन से? देखिए, रिटायर्ड लोग पैसेंजर ट्रेन को ज्यादा पसंद करते हैं, क्योंकि उसमें किराया कम लगता है। जब पैसेंजर ट्रेन की यात्रा करते हैं तो उसमें समय ज्यादा लगता है लेकिन रिटायर लोग को आमतौर पर समय की कोई कमी महसूस नहीं होती उनके पास समय ही समय रहता है। परंतु दूसरी तरफ देखें तो व्यस्त लोग superfast ट्रेन से यात्रा करते हैं क्योंकि मैंने समय की कीमत पता होती है और उन्हें समय की कमी रहती है और बचे हुए समय का सदुपयोग कर सकते हैं। बहुत ज्यादा व्यस्त लोग हवाई जहाज से यात्रा करते हैं, क्योंकि उनका समय और भी ज्यादा कीमती है। जिस व्यक्ति का समय जितना कीमती होता है, वह उसे बचाने के लिए उतनी ही ज्यादा पैसे खर्च करने को तैयार रहता है।
यदि आप समय के बजाय पैसे को बचाने की ज्यादा कोशिश करते हैं, तो इसका मतलब यह है कि आप अपने समय को ज्यादा महत्व(Importance) नहीं देते हैं।
दूसरी तरफ देखे तो, जो लोग समय को ज्यादा महत्वपूर्ण मानते हैं, वे समय बचाने की भरसक कोशिश करते हैं; एक तरह से कहा जाए तो वह समय को खरीद लेते हैं। कंपनी के मालिक यही तो करते हैं। ज़रा सोचें, कंपनी का कोई मालिक प्रोडक्ट का उत्पादन(production) नहीं करता है, उसका वितरण(delivery) नहीं करता है, उसका प्रबंधन(Management) नहीं करता है, उसे नहीं बेचता, लेकिन profit उसी को होता है। कंपनी का मालिक कर्मचारियों को salery देकर उनसे अपना मनचाहा काम करवा सकता है जो उसकी कंपनी के लिए अच्छा है। दूसरे शब्दों में कहें तो, कंपनी का मालिक दूसरों का समय खरीद लेता है।
चलिए एक उदाहरण से इसे समझते हैं, मान लें, आप हर महीने ₹20,000 कमाते हैं और इसके लिए आप महीने में 25 दिन 8 घंटे काम करते हैं। यानी आप कुल मिलाकर 200 घंटे काम करते हैं। इस स्थिति में आपके 1 घंटे का मूल्य होगा: 20,000/200 = 100 रुपए। इस आधार पर आप समय खरीदने का निर्णय ले सकते हैं।
चलिए एक और उदाहरण देखते हैं, आपको बिजली का बिल जमा करना है, जिसके लिए आने-जाने और लाइन में खड़े होने में 8 घंटे का समय लग सकता है। यदि कोई agent ₹20 लेकर यह काम करने को तैयार है, तो आपको क्या करना चाहिए? आपके लिए डेढ़ घंटे का मूल्य है ₹150, इसलिए अगर कोई वह काम ₹20 में करने को तैयार है, तो आपको खुशी-खुशी हां कर देना चाहिए, क्योंकि आपका समय बहुत ज़्यादा की़मती है। इस तरह पैसे देकर समय खरीदना सीखें। यह सिद्धांत बहुत ही महत्वपूर्ण है और बड़ी कंपनियां इसका फ़ायदा उठाती हैं। आधुनिक युग के outsourcing की निति इसी सिद्धांत पर आधारित है। अमेरिकी कंपनियां पैसे देकर अपना काम भारतीय कंपनियों से सस्ते में करवाती हैं और अपना कीमती समय बचाती हैं।
यह delegating (डेलीगेटिंग) या काम सौंपना नहीं है, यह इससे अलग बात हैं। डेलीगेटिंग में आप समय बचाने के लिए कम महत्वपूर्ण काम आप दूसरों को सौंपते हैं, जबकि समय खरीदते समय आप कम महत्वपूर्ण काम बाहरी लोगों से करवाते हैं।
19 वी सदी के मशहूर प्रकृति विज्ञान Louis Agassi को नियमित रूप से भाषण देने के लिए बुलाया जाता था। एक बार भी कोई महत्वपूर्ण काम कर रहे थे, जिसकी वजह से उनके पास time नहीं था। ऐसे में जब एक आयोजक ने उन्हें भाषण देने के लिए invite किया, तो उन्होंने इंकार कर दिया। आयोजक ने जोर देते हुए कहा कि भाषण के बदले में वे उन्हें पैसे देगा। यह सुनकर अगासी आगबबूला हो गए और बोले, 'पैसे का लालच मुझे नहीं डिगा सकता।'
आत्मनिर्भर लोगों को समय खरीदने में बड़ी दिक्क़त आती है, क्योंकि वह हर काम खुद करना चाहते हैं। कंजूस लोगों को भी इसमें समस्या आती है। वे पैसे बचाने के चक्कर में खुद ही छोटे-छोटे काम करना चाहते हैं, भले ही इस चक्कर में उनके बड़े और ज्यादा important काम ना हो पाए।
इसका एक रोचक उदाहरण देखें। क्या आपने कभी सोचा है कि साड़ी की दुकान पर पुरुष मोलभाव क्यों नहीं करते हैं और महिलाएं घंटों तक मोल भाव क्यों करती हैं? वैसे तो इसके बहुत कारण हैं, लेकिन इसका प्रमुख कारण हैं- समय! आमतौर पर पुरुषों के पास समय की कमी होती है, जबकि महिलाएं तुलनात्मक रूप से फुर्सत में होती हैं। एक बार फिर वही हिसाब लगा लें। अगर आपके 1 घंटे का value ₹100 है और 1 घंटे के मोल भाव के बाद आप दुकानदार से ₹20 कम करवाने में कामयाब हो जाते हैं, तो आप दरअसल घाटे में रहते हैं। वास्तव में आपको ₹20 का फायदा नहीं हुआ, बल्कि ₹80 का नुकसान हुआ है। एक कहावत है, 'समय ही धन है।' लेकिन अगर आप इसे उल्टा कर देते हैं, तो आपको एक मूल्यवान सत्य पता चलता है - 'धन ही समय है।'





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